रानीखेत। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित रानीखेत की ऐतिहासिक कोऑपरेटिव ड्रग फैक्टरी कभी आयुर्वेदिक दवाओं के उत्पादन और सहकारिता आधारित औद्योगिक विकास की मिसाल हुआ करती थी। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की पहल पर स्थापित इस फैक्टरी में कभी सैकड़ों प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियां तैयार की जाती थीं। देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने वाली यह इकाई आज बदहाली का सामना कर रही है। पिछले करीब चार वर्षों से उत्पादन बंद होने के कारण फैक्टरी की ऐतिहासिक विरासत और भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ब्रिटिश कालीन भव्य भवन में संचालित रही यह फैक्टरी कभी स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का प्रमुख माध्यम थी। इसके उत्पादों की मांग और कारोबार ने इसे प्रदेश की महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयों में शामिल किया था। हालांकि, समय के साथ प्रबंधन संबंधी समस्याओं, योजनाओं के धरातल पर न उतरने और निजीकरण के प्रयासों के बीच इसकी स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।
अब एक बार फिर इस ऐतिहासिक इकाई को पुनर्जीवित करने की कोशिशें शुरू हुई हैं। करीब तीन माह पहले सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने राज्य सहकारी संघ (यूसीएफ) के माध्यम से फैक्टरी को दोबारा शुरू करने की घोषणा की थी। इस घोषणा से स्थानीय लोगों और आयुर्वेद क्षेत्र से जुड़े लोगों में उम्मीद जगी, लेकिन अभी तक उत्पादन बहाल होने की दिशा में ठोस प्रगति सीमित नजर आ रही है। दूसरी ओर, राज्य सहकारी संघ के प्रबंध निदेशक आनंद शुक्ला ने नवंबर में उत्पादन शुरू करने का दावा किया है।
1954 में जीबी पंत की पहल पर हुई थी स्थापना
रानीखेत कोऑपरेटिव ड्रग फैक्टरी की स्थापना वर्ष 1954 में भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की पहल पर की गई थी। करीब सवा चार एकड़ क्षेत्र में स्थापित इस इकाई का उद्देश्य आयुर्वेदिक औषधियों के उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ सहकारिता के माध्यम से औद्योगिक गतिविधियों को मजबूत करना था।
समय के साथ फैक्टरी ने अपनी अलग पहचान बनाई। यहां तैयार होने वाली आयुर्वेदिक दवाओं की विभिन्न क्षेत्रों में मांग थी। उत्तराखंड राज्य गठन तक फैक्टरी का सालाना कारोबार करीब तीन से चार करोड़ रुपये बताया जाता है। यह आंकड़ा उस दौर में इकाई की व्यावसायिक क्षमता और बाजार में उसकी स्थापित पहचान को दर्शाता है।
फैक्टरी का महत्व केवल कारोबार तक सीमित नहीं था। यह आयुर्वेदिक औषधियों के पारंपरिक ज्ञान को उत्पादन के स्तर पर आगे बढ़ाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाली संस्था भी थी।
300 से अधिक आयुर्वेदिक उत्पादों का होता था निर्माण
अपने बेहतर संचालन के दौर में रानीखेत की इस फैक्टरी में लगभग 300 प्रकार के आयुर्वेदिक उत्पाद तैयार किए जाते थे। इनमें महाशंख वटी, आरोग्यवर्धिनी वटी, त्रिफला चूर्ण, अश्वगंधा चूर्ण, अर्जुनारिष्ट, दशमूलारिष्ट, महानारायण तेल और अभ्रक भस्म जैसे उत्पाद शामिल थे।
इन औषधियों के निर्माण के कारण फैक्टरी की पहचान आयुर्वेदिक दवा उत्पादन के क्षेत्र में मजबूत हुई थी। विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार करने की क्षमता इसे एक महत्वपूर्ण औषधि इकाई बनाती थी।
लेकिन उत्पादन बंद होने के बाद फैक्टरी की मशीनों, भवन और अन्य संसाधनों के समुचित उपयोग का सवाल भी सामने आया है। लंबे समय तक किसी औद्योगिक इकाई का बंद रहना न केवल उसकी उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि उसके दोबारा संचालन की लागत और तैयारियों को भी चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
राज्य गठन के बाद शुरू हुआ गिरावट का दौर
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद शुरुआती वर्षों में फैक्टरी का कारोबार जारी रहा, लेकिन करीब डेढ़ दशक बाद इसकी स्थिति बिगड़ने लगी। प्रबंधन और संचालन से जुड़ी चुनौतियों के बीच इकाई धीरे-धीरे कमजोर होती गई।
वर्ष 2017 में तत्कालीन सरकार की ओर से फैक्टरी परिसर में आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की शाखा खोलने की घोषणा की गई थी। हालांकि, यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी। इसके बाद फैक्टरी के निजीकरण का प्रयास किया गया, लेकिन इससे भी इकाई को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई।
आखिरकार उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया। पिछले करीब चार वर्षों से बंद पड़ी फैक्टरी आज अपने पुराने गौरव को वापस पाने की प्रतीक्षा कर रही है।
निजीकरण का प्रयास भी नहीं हुआ सफल
फैक्टरी को संचालित करने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी का विकल्प भी तलाशा गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, करीब छह वर्ष पहले बाबा रामदेव को भी इस इकाई को चलाने का प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि, उन्होंने निवेश में रुचि नहीं दिखाई।
इसके बाद फैक्टरी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रही। अब सरकार ने राज्य सहकारी संघ के माध्यम से इसे दोबारा संचालित करने की दिशा में प्रयास शुरू किए हैं।
यूसीएफ के माध्यम से फैक्टरी को पुराने स्वरूप में लाने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, इसके लिए भवन और मशीनरी की स्थिति का आकलन, आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था, उत्पादन संबंधी तैयारियां और बाजार में उत्पादों की दोबारा पहुंच सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।
यूसीएफ के जिम्मे फैक्टरी को पुनर्जीवित करने की चुनौती
सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत की घोषणा के बाद राज्य सहकारी संघ ने फैक्टरी को फिर से चालू करने की दिशा में गतिविधियां तेज करने की बात कही है। यूसीएफ के प्रबंध निदेशक आनंद शुक्ला के अनुसार, नवंबर में यहां उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह दावा स्थानीय लोगों और फैक्टरी से जुड़े हितधारकों के लिए उम्मीद जगाने वाला है। हालांकि, उत्पादन शुरू करने की निर्धारित समयसीमा को वास्तविक उपलब्धि में बदलने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।
फैक्टरी की वर्तमान स्थिति, मशीनों की उपयोगिता, कच्चे माल की उपलब्धता, कर्मचारियों की व्यवस्था, औषधियों के निर्माण के लिए आवश्यक मानकों और बाजार में वितरण की रणनीति जैसे पहलू इसके पुनरुद्धार में अहम भूमिका निभाएंगे। इन तैयारियों की वास्तविक स्थिति और उत्पादन शुरू होने की आधिकारिक पुष्टि सामने आने के बाद ही योजना की प्रगति का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा।
स्थानीय रोजगार और आयुर्वेद उद्योग को मिल सकती है नई ताकत
रानीखेत की इस ऐतिहासिक इकाई का पुनरुद्धार केवल एक बंद फैक्टरी को चालू करने तक सीमित नहीं होगा। यदि यहां नियमित उत्पादन बहाल होता है, तो इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने और आयुर्वेदिक औषधियों के उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की आपूर्ति, परिवहन, पैकेजिंग और वितरण जैसी गतिविधियों को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि, इन संभावित लाभों का वास्तविक आकार फैक्टरी की उत्पादन क्षमता, बाजार में मांग और भविष्य की व्यावसायिक रणनीति पर निर्भर करेगा।
फैक्टरी का ऐतिहासिक महत्व भी इसे विशेष बनाता है। वर्ष 1954 में स्थापित यह इकाई सहकारिता और आयुर्वेद के क्षेत्र में उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण विरासत रही है। ऐसे में इसका पुनर्जीवन स्थानीय अर्थव्यवस्था के साथ प्रदेश की औद्योगिक और पारंपरिक औषधि उत्पादन संबंधी पहचान के लिए भी अहम हो सकता है।
चार साल से बंद इकाई को अब इंतजार पुनर्जीवन का
एक समय सालाना तीन से चार करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली और करीब 300 प्रकार के आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली रानीखेत कोऑपरेटिव ड्रग फैक्टरी का मौजूदा हाल कई सवाल खड़े करता है। विश्वविद्यालय शाखा खोलने की घोषणा और निजीकरण के प्रयासों के सफल न होने के बाद अब सरकार ने यूसीएफ के जरिए इसे पुनर्जीवित करने की पहल की है।
नवंबर में उत्पादन शुरू करने के दावे के बीच अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि फैक्टरी में काम वास्तव में कब शुरू होता है और इसे कितनी प्रभावी तरीके से दोबारा स्थापित किया जा सकता है।
यदि प्रस्तावित योजना समय पर धरातल पर उतरती है, तो रानीखेत की यह ऐतिहासिक इकाई एक बार फिर आयुर्वेदिक औषधि उत्पादन और सहकारिता आधारित औद्योगिक विकास में अपनी भूमिका निभा सकती है। फिलहाल, चार साल से बंद फैक्टरी को उसके पुराने गौरव तक पहुंचाने की राह में ठोस कार्रवाई और नियमित उत्पादन की बहाली सबसे बड़ी कसौटी बनी हुई है।





