नई फिल्म नीति से बदली तस्वीर: मुंबई का सफर हुआ छोटा, अब उत्तराखंड में मिल रहा काम

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देहरादून। कभी उत्तराखंड के युवाओं के लिए फिल्मों में पहचान बनाने का मतलब मुंबई की राह पकड़ना था। लेकिन अब राज्य में फिल्म निर्माण और क्षेत्रीय सिनेमा को मिल रहे प्रोत्साहन से तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। उत्तराखंड फिल्म नीति-2024 के तहत स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करने के साथ राज्य को फिल्म शूटिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

नई फिल्म नीति का असर क्षेत्रीय सिनेमा पर भी दिखाई दे रहा है। सरकार के अनुसार, कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषा में बनने वाली फिल्मों को लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम दो करोड़ रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान है। इसका उद्देश्य स्थानीय भाषा और संस्कृति पर आधारित फिल्मों के निर्माण को बढ़ावा देना भी है।

फिल्म निर्माण से जुड़े अवसर केवल अभिनय तक सीमित नहीं हैं। कैमरा, मेकअप, कॉस्ट्यूम, लाइटिंग, एडिटिंग, प्रोडक्शन, लोकेशन मैनेजमेंट और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी स्थानीय युवाओं के लिए काम के अवसर बन रहे हैं।

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नीति के तहत फिल्म क्षेत्र में प्रशिक्षण को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वर्ष 2026 में उत्तराखंड के तीन युवाओं को एफटीआईआई, पुणे से पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्म नीति के तहत छात्रवृत्ति दी गई। नीति में प्रतिष्ठित फिल्म संस्थानों में प्रवेश लेने वाले उत्तराखंड के स्थायी निवासी विद्यार्थियों के लिए मेरिट के आधार पर छात्रवृत्ति का प्रावधान है।

क्षेत्रीय फिल्मों को मिलने वाले सरकारी सहयोग में भी वृद्धि हुई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 25 फिल्मों को 8.28 करोड़ रुपये का अनुदान दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

ऐसे में उत्तराखंड के उन युवाओं के लिए फिल्म क्षेत्र में आगे बढ़ने के रास्ते खुल रहे हैं, जिन्हें पहले अवसरों की तलाश में मुंबई या दूसरे बड़े फिल्म केंद्रों का रुख करना पड़ता था। हालांकि, स्थानीय स्तर पर रोजगार के वास्तविक विस्तार का आकलन करने के लिए आने वाले समय में फिल्मों की संख्या, स्थानीय कलाकारों-तकनीशियनों की भागीदारी और नियमित रोजगार के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे।