IIM काशीपुर में शीतलाखेत की बेटियों का बजा डंका, भीमल से तैयार किया हर्बल शैंपू; पहाड़ के पारंपरिक ज्ञान को दे रहीं उद्यमिता का रूप

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अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पहाड़ों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को रोजगार एवं स्वरोजगार से जोड़ने की दिशा में शीतलाखेत की दो छात्राओं ने सराहनीय पहल की है। राजकीय महाविद्यालय शीतलाखेत की छात्राएं रश्मि आर्या और सुहानी आर्या स्थानीय वनस्पति भीमल से हर्बल शैंपू तैयार कर रही हैं। उनके इस नवाचार ने भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) काशीपुर में आयोजित उद्यमिता विकास कार्यक्रम में विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों का ध्यान आकर्षित किया।

छात्राओं ने अपने उत्पाद के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया कि पहाड़ों में आसानी से उपलब्ध स्थानीय वनस्पतियों का उपयोग केवल पारंपरिक जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें आधुनिक उत्पादों के रूप में विकसित कर स्वरोजगार और छोटे व्यवसाय का आधार भी बनाया जा सकता है।

भीमल, रीठा और आंवले से तैयार किया प्राकृतिक उत्पाद

रश्मि और सुहानी ने अपने हर्बल शैंपू को तैयार करने के लिए पहाड़ों में पाए जाने वाले भीमल के पेड़ को मुख्य आधार बनाया है। इसके लिए वे भीमल की छाल और पत्तियों से अर्क प्राप्त करती हैं। इसके साथ रीठा, आंवला और रोजमेरी जैसे प्राकृतिक घटकों का इस्तेमाल किया जाता है।

छात्राओं के अनुसार, इस उत्पाद को तैयार करने में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है। भीमल जैसी पारंपरिक वनस्पति को एक उपयोगी उत्पाद के रूप में विकसित करना उनके नवाचार का प्रमुख हिस्सा है। इससे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता की संभावनाओं को भी बढ़ावा मिल सकता है।

आईआईएम काशीपुर के छह दिवसीय बूटकैंप में किया प्रस्तुतीकरण

देवभूमि उद्यमिता योजना के तहत आयोजित छह दिवसीय उद्यमिता विकास कार्यक्रम में छात्राओं ने अपने उत्पाद का विस्तार से प्रस्तुतीकरण किया। इस दौरान उन्होंने हर्बल शैंपू के निर्माण की प्रक्रिया, उसमें इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक घटकों और उत्पाद की विशेषताओं के बारे में जानकारी दी।

इसके अलावा उन्होंने उत्पाद की पैकेजिंग, ब्रांडिंग, बाजार में पहचान बनाने और विपणन की संभावनाओं पर भी अपनी बात रखी। छात्राओं ने बताया कि किसी स्थानीय उत्पाद को व्यावसायिक रूप देने के लिए केवल उसका निर्माण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता, आकर्षक पैकेजिंग, सही कीमत और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण होती है।

उनके इस प्रयास को कार्यक्रम में शामिल प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों ने सराहा। स्थानीय संसाधनों पर आधारित इस नवाचार को पहाड़ी क्षेत्रों में उद्यमिता विकसित करने की संभावनाओं से जोड़कर देखा गया।

30 से 32 भीमल के पेड़ों से जुटा रहीं कच्चा माल

छात्राओं के इस प्रयास की एक खास बात यह है कि वे अपने घर के आसपास मौजूद लगभग 30 से 32 भीमल के पेड़ों से शैंपू तैयार करने के लिए आवश्यक कच्चा माल जुटाती हैं। इन पेड़ों की छाल और पत्तियों से अर्क प्राप्त कर उसमें रीठा, आंवला और रोजमेरी मिलाई जाती है।

स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की उपलब्धता के कारण इस पहल में आसपास के प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की संभावना भी दिखाई देती है। यदि इस तरह के उत्पादों को उचित प्रशिक्षण, गुणवत्ता परीक्षण, मानकीकरण और बाजार से जुड़ने का अवसर मिले, तो भविष्य में इन्हें छोटे उद्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है।

अप्रैल में शुरू हुआ सफर, आईआईएम काशीपुर तक पहुंचीं छात्राएं

रश्मि आर्या और सुहानी आर्या की उद्यमिता यात्रा 10 अप्रैल 2026 को राजकीय महाविद्यालय शीतलाखेत में आयोजित देवभूमि उद्यमिता योजना के ओरिएंटेशन शिविर से शुरू हुई थी। इस शिविर में छात्राओं को उद्यमिता, स्वरोजगार और स्थानीय संसाधनों पर आधारित व्यवसाय की संभावनाओं से परिचित कराया गया।

इसके बाद अगस्त 2026 में हवालबाग में आयोजित प्रथम बूटकैंप में उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया। यहां से मिले अनुभव और मार्गदर्शन के आधार पर छात्राओं ने अपने उत्पाद को और बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की तैयारी की। इसके बाद 25 से 31 अक्टूबर 2026 तक आईआईएम काशीपुर में आयोजित दूसरे बूटकैंप में उन्होंने अपने हर्बल शैंपू का प्रस्तुतीकरण किया।

इस दौरान उन्हें उत्पाद निर्माण के साथ-साथ उद्यम शुरू करने, उसकी ब्रांडिंग, पैकेजिंग और बाजार में उतारने से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुईं।

महाविद्यालय प्रशासन ने जताई खुशी

दोनों छात्राओं की उपलब्धि पर राजकीय महाविद्यालय शीतलाखेत के प्राचार्य प्रो. एलपी वर्मा ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने छात्राओं के प्रयास को महाविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।

वहीं, देवभूमि उद्यमिता योजना की नोडल अधिकारी डॉ. वसुंधरा लस्पाल ने कहा कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित इस तरह के नवाचार युवाओं को स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और पहाड़ों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

पहाड़ की बेटियों की पहल से स्वरोजगार की नई उम्मीद

रश्मि और सुहानी का यह प्रयास केवल एक हर्बल शैंपू तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से उन्होंने पहाड़ की स्थानीय वनस्पतियों, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक उद्यमिता के बीच एक संभावित कड़ी स्थापित की है।

उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग स्थानीय उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है। जरूरत है तो उन्हें वैज्ञानिक तरीके से विकसित करने, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और बाजार तक पहुंचाने की। ऐसे में शीतलाखेत की इन दोनों छात्राओं की पहल क्षेत्र के अन्य युवाओं के लिए भी स्वरोजगार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा बन सकती है।