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Durgesh Kumar: थिएटर छोड़कर रंगमंच में इंजीनियर बनने के दौरान दुर्गेश ने ‘पंचायत’ के बनराकस बन गया

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दर्शकों की लोकप्रिय सीरीज पंचायत 3 आखिरकार आज रिलीज हो चुकी है। अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई टीवीएफ की वेब सीरीज पंचायत के दो सीजन पहले ही दर्शकों के बीच धमाल मचा चुके हैं, जिसकी कहानी और कलाकारों ने दर्शकों को बांधे रखा। इसके बाद बेसब्री से दर्शकों को सीजन 3 का इंतजार था, ताकि वे पंचायत के फुलेरा गांव के लोगों के बीच फिर मस्ती कर सके। सचिव जी, प्रधान से लेकर बिनोद ने दर्शकों को खूब आकर्षित किया, लेकिन भूषण का किरदार निभाने वाले अभिनेता दुर्गेश कुमार सीरीज की जान बन गए, जिन्हें फुलेरावासी बनराकस बोलते हैं। अब बनराकास तीसरे सीरीज में भी अपनी खलनायकी दिखाने वापस आ गए हैं। उनकी अदाकारी ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया है। ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें…
पंचायत 2 में फुलेरा गांव के भूषण कुमार, उर्फ बनराकस, बिहार के दरभंगा जिले के निवासी हैं। यद्यपि दुर्गेश का रोल पहले सीजन में बहुत छोटा था, फिर भी वे दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ने में कामयाब रहे। दूसरे सीज़न में वे “पंचायत” की जान बन गए। उन्हें इस सीजन में गांव के हर काम में नुक्स निकालते और तंबाकू रगड़ते हुए ‘विनोद’ को बागी होने के लिए प्रेरित करते देखा गया। दुर्गेश के किरदार ने हल्की मुस्कान के साथ ताना मारते हुए दूसरे सीजन में गांव के प्रधान और सचिव के खिलाफ जंग का आह्वान किया और कहा कि अगले चुनाव में अपनी पत्नी को प्रधानी का पद देंगे।
दुर्गेश कुमार ने अमर उजाला के साथ एक साक्षात्कार में बताया कि उनके पिता डॉ. हरिकृष्ण चौधरी बिहार के सीएम आर्ट्स कॉलेज में कॉमर्स के प्रोफेसर थे। वे चाहते थे कि मैं पढ़ाई करके इंजीनियर बन जाऊँ। उन्होंने सीएम साइंस कॉलेज, दरभंगा से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। उस बीच, उनके बड़े भाई डॉ. शिवशक्ति चौधरी दिल्ली आकर यूपीएससी की तैयारी करने लगे। 2001 में दुर्गेश भी उनके साथ दिल्ली आए। दुर्गेश ने अजय कटारिया के उद्देश्य थिएटर ग्रुप में व्यक्तित्व विकास की कोशिश की। उन्होंने वहां पाँच सौ दिन तक अभिनय, भाव प्रकटन, आत्मविश्वास और अन्य कई बारीकियां सीखीं। वहीं उन्होंने अपना पहला नाटक, ‘ताजमहल का टेंडर’, लिखा, अजय शुक्ला। नाटक में दुर्गेश ने चपरासी का काम किया था।

दुर्गेश ने इंजीनियरिंग की तैयारी भी की। उनकी परीक्षा तीन बार फेल हो गई। बाद में अभिनेता ने हिंदी साहित्य में स्नातक किया। “ताजमहल का टेंडर” के बाद वे खुद का थिएटर चलाने लगे। फिर उन्होंने रोहित त्रिपाठी के साथ महारथी कर्ण की प्रस्तुति की। श्रीराम सेंटर ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स एंड कल्चर से भी दो साल का डिप्लोमा प्राप्त किया। उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातक करने के बाद एनएसडी का फॉर्म भरा, लेकिन चयन नहीं हुआ। फिर भी उन्होंने थिएटर में काम करना जारी रखा। 2008 में वे एनएसडी में चुने गए।