श्रीनगर गढ़वाल से बदरी-केदार तक भूकंपीय गतिविधियां बढ़ा रहीं चिंता, लगातार महसूस हो रहे हल्के झटकों से पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ सकता है भूस्खलन का जोखिम
श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार अंतराल पर महसूस किए जा रहे हल्के भूकंपीय झटकों ने एक बार फिर भूगर्भीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों में होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों का असर केवल भूकंप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे पहले से संवेदनशील भूस्खलन वाले क्षेत्रों में अस्थिरता बढ़ने का खतरा भी बना रहता है।
गढ़वाल क्षेत्र में श्रीनगर से लेकर बदरीनाथ और केदारनाथ धाम क्षेत्र तक का इलाका भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। पहाड़ों की कमजोर भू-संरचना, ढलानों पर बढ़ता दबाव और प्राकृतिक एवं मानवीय गतिविधियां इस संवेदनशीलता को और महत्वपूर्ण बना देती हैं।
हल्के झटकों से भी पहाड़ पर असर
पर्वतीय इलाकों में समय-समय पर आने वाले कम तीव्रता के भूकंप आमतौर पर बड़े नुकसान का कारण नहीं बनते, लेकिन लगातार होने वाली भूगर्भीय हलचल पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। विशेषकर उन स्थानों पर जहां चट्टानों में पहले से दरारें मौजूद हैं या जमीन कमजोर है, वहां भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
बारिश के दौरान यह जोखिम और बढ़ जाता है। पानी चट्टानों और मिट्टी के भीतर पहुंचकर ढलानों को कमजोर करता है। ऐसे में यदि क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधियां भी जारी रहें तो संवेदनशील ढलानों पर मलबा खिसकने की घटनाएं सामने आ सकती हैं।
श्रीनगर से बदरी-केदार तक संवेदनशील क्षेत्र
गढ़वाल का बड़ा हिस्सा भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है। श्रीनगर गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, चमोली और बदरी-केदार क्षेत्र में ऊंचे पहाड़ों, गहरी घाटियों और खड़ी ढलानों के कारण प्राकृतिक रूप से भू-स्खलन का जोखिम बना रहता है।
सड़क निर्माण, पहाड़ों की कटिंग, भारी बारिश और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण कई स्थानों पर ढलानों की स्थिरता प्रभावित होती है। ऐसे में भूकंपीय गतिविधि इन कमजोर क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।
भूस्खलन जोन पर विशेष निगरानी की जरूरत
पहाड़ों में पहले से चिन्हित भूस्खलन जोन पर लगातार निगरानी रखना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, चट्टानों में नई दरारें, जमीन में बदलाव, पेड़ों या बिजली के खंभों का झुकना और सड़क किनारे अचानक मलबा आने जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विशेष रूप से चारधाम यात्रा मार्गों पर ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इन मार्गों पर वर्षभर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और यात्री आवाजाही करते हैं।
प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से चुनौतीपूर्ण उत्तराखंड
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति इसे भूकंप और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील बनाती है। हिमालय अभी भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखला है। इसलिए यहां होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों पर वैज्ञानिक निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों की समय-समय पर जांच बेहद महत्वपूर्ण है।
हालांकि, हल्के भूकंप के झटकों को अपने आप किसी बड़े भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। भूकंप का सटीक समय और तीव्रता पहले से बताना संभव नहीं है। लेकिन लगातार भूकंपीय गतिविधियों के बीच संवेदनशील ढलानों और भूस्खलन क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाना आपदा जोखिम को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
श्रीनगर गढ़वाल से बदरी-केदार तक पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए भूकंपीय गतिविधियों के साथ-साथ सक्रिय भूस्खलन जोन पर नजर रखना आने वाले समय में प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती होगी।





