देहरादून। उत्तराखंड शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान लगातार मजबूत कर रहा है। राज्य गठन के समय जहां सीमित संसाधन, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, विद्यालयों तक पहुंच की कमी और विद्यार्थियों के बीच ड्रॉपआउट जैसी चुनौतियां थीं, वहीं आज शिक्षा व्यवस्था में कई स्तरों पर सुधार देखने को मिल रहा है। हाईस्कूल परीक्षा के उत्तीर्ण प्रतिशत में हुई उल्लेखनीय बढ़ोतरी से लेकर विद्यालयों में डिजिटल सुविधाओं के विस्तार और उच्च शिक्षा में आधुनिक तकनीकी पाठ्यक्रमों की शुरुआत तक, राज्य ने पिछले 26 वर्षों में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।
अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) के प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए इन उपलब्धियों को अगले स्तर तक पहुंचाने की तैयारी है। सरकार का लक्ष्य शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों को कौशल आधारित, रोजगारपरक और व्यावहारिक शिक्षा से जोड़ना है। नीति के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन होने पर प्रदेश के युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर विकसित हो सकते हैं। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा संबंधी प्रदर्शन और रैंकिंग में भी राज्य की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है।
32.6 प्रतिशत से बढ़कर 92.10 प्रतिशत पहुंचा हाईस्कूल पास रेट
राज्य गठन के समय उत्तराखंड में हाईस्कूल परीक्षा का उत्तीर्ण प्रतिशत महज 32.6 प्रतिशत था। विद्यालयों की सीमित उपलब्धता, संसाधनों की कमी और पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन की कठिनाइयां विद्यार्थियों की शिक्षा के रास्ते में बड़ी बाधा थीं। समय के साथ विद्यालयों की संख्या बढ़ाने, शिक्षकों के प्रशिक्षण, शैक्षणिक सुविधाओं के विस्तार और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए गए।
इन प्रयासों का असर परीक्षा परिणामों में भी दिखाई दिया। वर्ष 2026 में उत्तराखंड बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा का उत्तीर्ण प्रतिशत बढ़कर 92.10 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह आंकड़ा राज्य की स्कूली शिक्षा में आए बदलाव को दर्शाता है। हालांकि, केवल परीक्षा परिणाम ही शिक्षा की गुणवत्ता का पैमाना नहीं हैं। विद्यार्थियों में विषयों की समझ, व्यावहारिक ज्ञान और रोजगारपरक कौशल विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
6322 विद्यालयों में डिजिटल लर्निंग की सुविधा
शिक्षा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए उत्तराखंड में डिजिटल लर्निंग के बुनियादी ढांचे का विस्तार किया गया है। प्रदेश के 6322 विद्यालयों में डिजिटल माध्यम से पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।
इनमें 4629 विद्यालयों में स्मार्ट क्लास, 1340 विद्यालयों में वर्चुअल माध्यम और 363 विद्यालयों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के जरिए शिक्षण की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा वर्चुअल शिक्षण प्रसारण के लिए प्रदेश में छह स्टूडियो स्थापित किए गए हैं।
इन माध्यमों से विद्यार्थियों को कक्षा शिक्षण के साथ डिजिटल सामग्री का लाभ भी मिल रहा है। प्रसारित कक्षाओं को यूट्यूब पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था से विद्यार्थी अवकाश के दिनों में भी घर बैठे पढ़ाई कर सकते हैं। इससे दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों के विद्यार्थियों को अतिरिक्त शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है।
उच्च शिक्षा में एआई और ड्रोन टेक्नोलॉजी जैसे पाठ्यक्रम
प्रदेश में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा को भी बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है। सरकारी और निजी महाविद्यालयों तथा तकनीकी संस्थानों में मशीन लर्निंग, डेटा एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ड्रोन टेक्नोलॉजी और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे आधुनिक विषयों से जुड़े पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
वर्तमान में प्रदेश के 425 महाविद्यालयों में करीब 4.72 लाख विद्यार्थी पारंपरिक और तकनीकी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन पाठ्यक्रमों का उद्देश्य विद्यार्थियों को नई तकनीकों से परिचित कराने के साथ भविष्य के रोजगार बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना है।
तकनीकी शिक्षा का विस्तार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आने वाले समय में उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में डिजिटल कौशल की मांग बढ़ने की संभावना है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा उपलब्ध होने से युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर जाने की आवश्यकता भी कम हो सकती है।
665 करोड़ से बढ़कर 12,401 करोड़ हुआ शिक्षा बजट
राज्य गठन के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बजटीय निवेश में भी बड़ा बदलाव आया है। राज्य गठन के समय स्कूली शिक्षा का कुल बजट करीब 665 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 12,401 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
प्रारंभिक शिक्षा का बजट 342 करोड़ रुपये से बढ़कर 4384 करोड़ रुपये हो गया है। वहीं माध्यमिक शिक्षा का बजट 423 करोड़ रुपये से बढ़कर 7017 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
शिक्षा बजट में इस वृद्धि से विद्यालयों के बुनियादी ढांचे, शिक्षण सुविधाओं, डिजिटल संसाधनों और शैक्षणिक गतिविधियों के विस्तार के लिए अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध हुए हैं। हालांकि, बढ़े हुए बजट का लाभ प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र और विद्यालय तक समान रूप से पहुंचाना भी महत्वपूर्ण चुनौती है।
शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा और अध्यात्म से जोड़ने की पहल
उत्तराखंड में आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को भी महत्व देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा को अध्यात्म, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने के उद्देश्य से ‘ज्ञानपथ’ जैसी पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है।
इस दिशा में दून विश्वविद्यालय का हिंदी अध्ययन केंद्र भी एक उदाहरण है। ऐसी पहलों के माध्यम से विद्यार्थियों को आधुनिक विषयों के साथ भारतीय साहित्य, दर्शन, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान से परिचित कराने पर जोर दिया जा रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी विद्यार्थियों के समग्र विकास, बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और स्थानीय भाषाओं एवं ज्ञान परंपराओं को प्रोत्साहित करने पर बल देती है।
नई शिक्षा नीति से रोजगारपरक शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत शिक्षा व्यवस्था को अधिक लचीला, व्यावहारिक और कौशल आधारित बनाने की परिकल्पना की गई है। इसमें शुरुआती कक्षाओं से बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान विकसित करने, व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने, विषयों के बीच की पारंपरिक सीमाओं को कम करने और विद्यार्थियों को उनकी रुचि के अनुसार विषय चुनने के अवसर देने पर जोर है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए यह नीति विशेष महत्व रखती है। यहां पर्यटन, कृषि, बागवानी, आयुर्वेद, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कौशल विकसित किए जा सकते हैं। यदि इन क्षेत्रों को शिक्षा और प्रशिक्षण से जोड़ा जाता है तो युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ सकते हैं।
सरकारी विद्यालयों के सामने अभी भी कई चुनौतियां
शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के बावजूद उत्तराखंड के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं। विशेष रूप से पर्वतीय जिलों के दूरस्थ क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं:
- शिक्षा की गुणवत्ता: सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर बेहतर बनाए रखना और विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट रोकना।
- बुनियादी सुविधाएं: सभी विद्यालयों में भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, पेयजल, शौचालय और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- शिक्षकों के रिक्त पद: सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के खाली पदों को समय पर भरना और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
- पर्वतीय क्षेत्रों में तकनीकी शिक्षा: दूरस्थ विद्यालयों तक इंटरनेट, कंप्यूटर और आधुनिक शिक्षण सुविधाएं पहुंचाना।
- पलायन पर रोक: स्थानीय परिस्थितियों और रोजगार की संभावनाओं से जुड़ी शिक्षा उपलब्ध कराकर विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर देना।
शिक्षा मंत्री बोले- एनईपी से आएगा बड़ा बदलाव
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अनुसार, उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत किया जा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इसके सकारात्मक परिणाम जल्द दिखाई देंगे। उनके अनुसार, राज्य गठन के बाद 26 वर्षों में प्रदेश ने शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
कुल मिलाकर उत्तराखंड ने स्कूली शिक्षा की पहुंच बढ़ाने, परीक्षा परिणामों में सुधार, डिजिटल शिक्षण और उच्च शिक्षा में आधुनिक तकनीकी पाठ्यक्रमों के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब असली चुनौती इन उपलब्धियों को शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों के कौशल और रोजगार के अवसरों में बदलने की है। यदि नई शिक्षा नीति का प्रभावी और समान रूप से क्रियान्वयन होता है तो उत्तराखंड आने वाले वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर सकता है।





