गोपेश्वर। उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृति से जुड़ी मां नंदा देवी की बड़ी जात अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ रही है। मायके से ससुराल कैलास के लिए विदा हो रही मां नंदा के स्वागत में ग्रामीण जगह-जगह श्रद्धा और भक्ति के साथ जुटे हैं। यात्रा के प्रत्येक पड़ाव पर मां नंदा के जागरों और पारंपरिक पूजा-अर्चना से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
बुधवार को बड़ी जात यात्रा अपने पांचवें पड़ाव के लिए रवाना हुई। यात्रा के दौरान सिद्धपीठ बैरासकुंड पहुंचने पर मां नंदा का भगवान शिव से भावपूर्ण मिलन हुआ। इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुओं की भारी आस्था देखने को मिली। पूजा-अर्चना और जागरों के बीच पूरा क्षेत्र मां नंदा की भक्ति में डूबा रहा।
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Toggleबैरासकुंड में हुआ शिव-नंदा का मिलन
बैरासकुंड को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यहां बड़ी जात के पहुंचने पर मां नंदा और भगवान शिव के मिलन की परंपरा निभाई गई। इस दौरान विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और देवी-देवताओं का अवतरण भी हुआ।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां नंदा का स्वागत किया। यात्रा के साथ चल रहे श्रद्धालु जागरों और भजनों के माध्यम से देवी की स्तुति करते रहे।
रावण की भी हुई पूजा
बैरासकुंड में धार्मिक परंपराओं के तहत रावण की भी पूजा-अर्चना की गई। यहां भगवान शिव से जुड़ी मान्यताओं के कारण रावण की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान देवी-देवताओं का अवतरण होने से माहौल और भी आध्यात्मिक हो गया।
बड़ी जात यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के लिए यह पड़ाव धार्मिक और भावनात्मक रूप से विशेष रहा। मां नंदा की यात्रा से जुड़े पारंपरिक अनुष्ठानों को देखने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के साथ दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु भी मौजूद रहे।
मटई ग्वाड़ में हुआ रात्रि विश्राम
बैरासकुंड में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद मां नंदा की बड़ी जात आगे के पड़ाव के लिए रवाना हुई। यात्रा मटई ग्वाड़ पहुंची, जहां रात्रि विश्राम किया गया।
यात्रा के अगले पड़ावों को लेकर भी ग्रामीणों में उत्साह बना हुआ है। मां नंदा के कैलास गमन की इस यात्रा में हर पड़ाव पर स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप पूजा-अर्चना की जाती है।
जागरों से गूंज रहे नंदा के पड़ाव
मां नंदा की बड़ी जात के साथ चल रहे श्रद्धालुओं के लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखने वाला पर्व भी है। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा, पूजा-अर्चना और जागरों के माध्यम से मां नंदा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर रहे हैं।
मायके से ससुराल कैलास की ओर मां नंदा की विदाई से जुड़े इस भावुक प्रसंग में ग्रामीणों की आस्था साफ दिखाई दे रही है। यात्रा आगे बढ़ने के साथ नए पड़ावों पर भी विशेष धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक कार्यक्रम होंगे।




