अल्मोड़ा की कोसी नदी का दर्द: 24 साल में 31 करोड़ खर्च, फिर भी अधूरी सीवर लाइन योजना; रोज नदी में जा रहा लाखों लीटर सीवेज

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अल्मोड़ा। पहाड़ों की जीवनरेखा कही जाने वाली कोसी नदी इन दिनों प्रदूषण का दर्द झेल रही है। अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों की बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराने वाली इस नदी को स्वच्छ और निर्मल रखने के लिए पिछले 24 वर्षों में करीब 31 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद सीवर लाइन बिछाने की योजना पूरी नहीं हो सकी है। अब तक महज 12 किलोमीटर सीवर लाइन ही बन पाई है।

सीवर व्यवस्था अधूरी रहने का सीधा असर कोसी नदी पर पड़ रहा है। शहर और आसपास के इलाकों से निकलने वाला सीवेज पूरी तरह से उपचारित होकर नदी में पहुंचने के बजाय कई जगहों से सीधे जलधारा में मिल रहा है। इसके चलते नदी का पानी लगातार प्रदूषित हो रहा है और कोसी की निर्मलता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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24 साल में 31 करोड़ खर्च, फिर भी लक्ष्य अधूरा

कोसी नदी को प्रदूषण से बचाने और शहर के सीवेज को व्यवस्थित तरीके से ट्रीट करने के उद्देश्य से वर्षों पहले सीवर लाइन परियोजना शुरू की गई थी। उम्मीद थी कि सीवर नेटवर्क तैयार होने के बाद शहर से निकलने वाला गंदा पानी सीधे नदी में नहीं पहुंचेगा।

लेकिन करीब ढाई दशक बीत जाने के बाद भी योजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। 24 वर्षों में 31 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद केवल 12 किलोमीटर सीवर लाइन का निर्माण हो पाया है। अधूरी व्यवस्था के कारण नदी में सीवेज का गिरना अब भी जारी है।

लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली नदी पर संकट

कोसी नदी सिर्फ अल्मोड़ा की पहचान ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी भी है। यह नदी लंबे समय से आसपास की आबादी की पेयजल जरूरतों और कृषि गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। पहाड़ों के खेतों तक पानी पहुंचाने में भी इसका योगदान है।

ऐसे में नदी में लगातार सीवेज का मिलना केवल पर्यावरण से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि जनस्वास्थ्य और भविष्य की जल सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर विषय है। नदी के प्रदूषित होने से जलीय पारिस्थितिकी और आसपास के पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सड़क कटने और भूस्खलन का मलबा भी बन रहा मुसीबत

कोसी नदी को केवल सीवेज प्रदूषण का ही सामना नहीं करना पड़ रहा। पहाड़ों में सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के दौरान कटने वाली पहाड़ियों का मलबा तथा बरसात के दौरान होने वाले भूस्खलन का मलबा भी कई बार नदी तक पहुंचता है।

इससे नदी की प्राकृतिक धारा प्रभावित होने के साथ जल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। एक ओर जहां प्राकृतिक कारणों से नदी पर दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवीय गतिविधियों से निकलने वाला सीवेज समस्या को और गंभीर बना रहा है।

अधूरी सीवर व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 24 साल और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सीवर लाइन का काम पूरा क्यों नहीं हो सका? यदि शहर के सभी प्रमुख हिस्सों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने में अभी भी कमी है, तो नदी को प्रदूषण से बचाने की योजना अपने मूल उद्देश्य को किस हद तक पूरा कर पा रही है।

सीवर लाइन का निर्माण पूरा होने और सीवेज के उचित उपचार की व्यवस्था होने के बाद ही कोसी नदी पर पड़ने वाले प्रदूषण के दबाव को प्रभावी तरीके से कम किया जा सकता है।

कोसी को बचाने के लिए जरूरी है ठोस कार्रवाई

कोसी नदी की स्थिति यह सवाल उठाती है कि जिस नदी पर बड़ी आबादी की जल जरूरतें निर्भर हैं, उसकी स्वच्छता और संरक्षण को लेकर कितनी गंभीरता बरती जा रही है। नदी को बचाने के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना और बजट खर्च करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सीवर नेटवर्क को पूरा करने, सीवेज का उपचार सुनिश्चित करने और नदी में सीधे गंदा पानी गिरने से रोकने की जरूरत है।

कोसी का दर्द केवल एक नदी के प्रदूषण की कहानी नहीं है। यह पहाड़ों में बढ़ते शहरीकरण, अधूरी बुनियादी सुविधाओं और प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण के बीच पैदा हो रहे उस संकट की तस्वीर है, जिसका असर आने वाले समय में पूरी आबादी पर पड़ सकता है।