29 सितंबर 2022 को परमार्थ निकेतन पहुंचे थे नाना पाटेकर, गंगा आरती में हुए शामिल; बोले थे- बाहरी दिखावे से नहीं, इंसान की असली पहचान उसके भीतर से होती है
देहरादून/ऋषिकेश। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर ने देशभर में उनके प्रशंसकों को गहरे शोक में डाल दिया है। 75 वर्षीय अभिनेता का गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर कार्डियक अरेस्ट के बाद निधन हो गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका।
नाना पाटेकर के निधन के बाद उनकी फिल्मों, दमदार संवादों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी यादें एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा में हैं। इन्हीं यादों में उत्तराखंड के ऋषिकेश की वह शाम भी शामिल है, जब नाना पाटेकर गंगा आरती में शामिल हुए थे और जीवन को लेकर बेहद सहज लेकिन गहरी बात कही थी।
गंगा किनारे अभिनेता नहीं, एक साधारण इंसान नजर आए थे नाना
29 सितंबर 2022 को नाना पाटेकर ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन पहुंचे थे। गंगा के पवित्र तट पर आयोजित आरती में उन्होंने हिस्सा लिया। उस समय का माहौल आध्यात्मिक था—सामने गंगा की धारा, आरती की लौ और चारों ओर मंत्रोच्चार के बीच नाना पाटेकर कुछ देर के लिए फिल्मी दुनिया की चमक-दमक से बिल्कुल अलग नजर आए।
नाना अपने अभिनय और खासतौर पर अपनी दमदार आवाज, तीखे संवाद और प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस के लिए जाने जाते रहे। लेकिन गंगा आरती के दौरान उनके विचारों में आध्यात्मिकता और आत्मचिंतन की झलक दिखाई दी।
उन्होंने जीवन में बाहरी दिखावे की बजाय इंसान के भीतर मौजूद गुणों को महत्वपूर्ण बताया था। उनके शब्दों का भाव था कि अच्छे कपड़े, बाहरी साज-सज्जा और दिखावा इंसान की वास्तविक पहचान नहीं हैं; उसके भीतर का इंसान ही उसकी असली पहचान और वास्तविक गहना है।
‘हमारे अंदर जो है, वही हमारा वास्तविक गहना है’
नाना पाटेकर ने उस दौरान कहा था कि केवल अच्छे कपड़े पहनने या बाहरी रूप से सजने-संवरने से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता। इंसान के भीतर क्या है, उसका व्यवहार कैसा है और वह दूसरों के प्रति कैसा नजरिया रखता है—यही उसकी वास्तविक पहचान है।
उनकी यह बात आज उनके निधन के बाद और भी ज्यादा भावुक कर रही है। जिस अभिनेता ने पर्दे पर अपनी आवाज से लाखों दर्शकों को प्रभावित किया, उसी आवाज में ऋषिकेश की गंगा के किनारे जीवन की सादगी और आत्मचिंतन की बात सुनाई दी थी।
गंगा आरती के बाद महसूस किया था भीतर बदलाव
परमार्थ निकेतन में गंगा आरती का आध्यात्मिक वातावरण देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। आश्रम के अनुसार, यहां होने वाली गंगा आरती रोज सूर्यास्त के समय गंगा घाट पर आयोजित होती है और इसका उद्देश्य लोगों को आध्यात्मिक शांति और आंतरिक जुड़ाव का अनुभव कराना है।
नाना पाटेकर ने भी आरती में शामिल होने के बाद अपने भीतर बदलाव महसूस होने की बात कही थी। उनके लिए यह केवल धार्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं था, बल्कि अपने भीतर झांकने और जीवन को अलग नजरिए से देखने का अवसर भी था।
आज उनकी आवाज याद बनकर रह गई
नाना पाटेकर की पहचान केवल एक अभिनेता के तौर पर नहीं थी। ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘सलाम बॉम्बे!’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता साबित की। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित कई सम्मान मिले और उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था।
उनकी संवाद अदायगी ऐसी थी कि सामान्य शब्द भी उनके मुंह से निकलकर यादगार बन जाते थे। यही वजह है कि उनके निधन के बाद उनके पुराने संवाद और वीडियो सोशल मीडिया पर फिर से साझा किए जा रहे हैं।
लेकिन ऋषिकेश की वह शाम उनकी जिंदगी के एक अलग पहलू को सामने लाती है—जहां पर्दे का वह सख्त और प्रभावशाली अभिनेता गंगा के किनारे खड़ा होकर मनुष्य के भीतर की अच्छाई को बाहरी चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण बता रहा था।
उत्तराखंड से जुड़ी यह स्मृति अब और खास
नाना पाटेकर का ऋषिकेश दौरा भले कुछ वर्षों पुराना हो, लेकिन उनके निधन के बाद यह स्मृति उत्तराखंड के लिए भी भावुक कर देने वाली बन गई है। गंगा आरती की वह शाम, उनके विचार और उनकी विशिष्ट आवाज अब एक याद बन चुके हैं।
गंगा की धारा उस दिन भी बह रही थी और आज भी बह रही है। बदल गया है तो सिर्फ एक दृश्य—जिस दमदार आवाज को सुनने के लिए लाखों लोग ठहर जाते थे, वह अब यादों में सुनाई देगी।
और शायद नाना पाटेकर के उन्हीं शब्दों में उनकी इस यात्रा की सबसे सुंदर याद छिपी है—इंसान का असली गहना उसके बाहर नहीं, उसके भीतर होता है।





