बदरीनाथ धाम में शंख नहीं बजाया जाता, फिर कैसे हुआ डीजे कॉन्सर्ट? धार्मिक परंपरा से लेकर प्रशासनिक विवाद तक समझिए पूरा मामला

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चमोली। उत्तराखंड के प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में हाल ही में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान तेज संगीत और डीजे पर हुई प्रस्तुतियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 19 और 20 सितंबर 2026 को बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और संगीत कार्यक्रम हुए। वीडियो सामने आने के बाद तीर्थपुरोहितों, संतों और कुछ नेताओं ने आयोजन के स्वरूप पर सवाल उठाए।

कार्यक्रम सेना के ऑपरेशन सद्भावना के तहत चमोली जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग के सहयोग से आयोजित किया गया था। विवाद बढ़ने के बाद चमोली जिला प्रशासन ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर से कार्यक्रम और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर स्पष्टीकरण मांगा।

बदरीनाथ मंदिर में क्यों नहीं बजाया जाता शंख?

बदरीनाथ मंदिर में शंख न बजाने की परंपरा को लेकर अलग-अलग पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब मां लक्ष्मी बदरीनाथ में तपस्या कर रही थीं, तब भगवान विष्णु ने शंखचूर्ण का वध किया था। मां लक्ष्मी की तपस्या में बाधा न पड़े, इसलिए शंख नहीं बजाया गया और बाद में यह परंपरा बनी रही।

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एक अन्य पौराणिक कथा में अतापी और वतापी नामक राक्षसों का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार, वतापी शंख में छिप गया था और इसी वजह से बदरीनाथ में शंख बजाने की परंपरा नहीं है। ये धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनकी व्याख्या विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग मिलती है।

वैज्ञानिक कारण को लेकर भी है मान्यता

शंख न बजाने के पीछे एक कथित वैज्ञानिक व्याख्या भी दी जाती है। स्थानीय जानकारों के अनुसार, बदरीनाथ अत्यधिक ऊंचाई और बर्फीले पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। शंख की तेज और गूंजने वाली ध्वनि पहाड़ों और बर्फीली चट्टानों से टकराकर कंपन पैदा कर सकती है, जिससे हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक घटनाओं का खतरा बढ़ने की आशंका बताई जाती है।

हालांकि, इस वैज्ञानिक दावे को स्थापित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले विशेषज्ञ प्रमाण की जरूरत है। इसे स्थानीय मान्यता/व्याख्या के रूप में देखना अधिक उचित है।

फिर डीजे कॉन्सर्ट पर क्यों उठे सवाल?

यही सवाल अब विवाद के केंद्र में है। मंदिर के भीतर शंख न बजाने की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का हवाला देते हुए आलोचकों ने पूछा कि उसी पवित्र क्षेत्र के पास तेज आवाज में संगीत और नृत्य का आयोजन कैसे किया गया।

हालांकि, कार्यक्रम मुख्य मंदिर के भीतर नहीं बल्कि टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित हुआ था, जो मंदिर के समीप स्थित है। पर्यटन एवं संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की ओर से यह भी कहा गया है कि बदरीनाथ में मंदिर परिसर के बाहर सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर कोई सामान्य प्रतिबंध नहीं है।

प्रशासन ने सेना से मांगा स्पष्टीकरण

विवाद बढ़ने के बाद चमोली जिला प्रशासन ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर को नोटिस जारी कर कार्यक्रम की अनुमति और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। प्रशासन ने आयोजन के स्वरूप और ध्वनि स्तर को बदरीनाथ की धार्मिक गरिमा से जोड़कर सवाल उठाए हैं।

वहीं, बाद की रिपोर्टों में प्रशासन और सेना के बीच कार्यक्रम की जिम्मेदारी तथा अनुमति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन ने कहा कि उसने आयोजन में सहयोग किया था, जबकि कार्यक्रम का प्रारूप और प्रस्तुतियों का चयन सेना की ओर से किया गया था।

विवाद अब सिर्फ डीजे तक सीमित नहीं

इस पूरे मामले ने बदरीनाथ जैसे धार्मिक स्थल पर धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पर्यटन और ध्वनि प्रबंधन के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी है। एक पक्ष धार्मिक स्थल की मर्यादा और शांत वातावरण बनाए रखने पर जोर दे रहा है, जबकि आयोजन से जुड़े पक्ष इसे स्थानीय संस्कृति, लोक कला और पर्यटन को बढ़ावा देने वाला कार्यक्रम बता रहे हैं।

फिलहाल प्रशासनिक स्पष्टीकरण और आयोजन की परिस्थितियों को लेकर तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। इसलिए ‘बिना अनुमति डीजे कॉन्सर्ट हुआ’ या आयोजन पूरी तरह अनधिकृत था, इसे अंतिम तथ्य के रूप में कहना जांच/स्पष्टीकरण पूरा होने तक उचित नहीं होगा।