इंतजार करते-करते दुनिया से चली गईं चंद्रा देवी, घोषणा के एक दशक बाद भी सापुली तक नहीं पहुंची सड़क

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सापुली सड़क का इंतजार करते-करते बागेश्वर जिले की कर्मी ग्राम पंचायत के सापुली तोक निवासी चंद्रा देवी दुनिया से विदा हो गईं। गांव तक सड़क पहुंचने का सपना उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका। लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा ने एक बार फिर क्षेत्र में सड़क सुविधा के अभाव की गंभीर तस्वीर सामने ला दी।

ग्रामीणों के अनुसार, चंद्रा देवी ने जीवनभर गांव तक सड़क पहुंचने की उम्मीद बनाए रखी। हालांकि, सड़क निर्माण की घोषणा हुए लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी सापुली तोक तक सड़क नहीं पहुंच सकी। आज भी ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों और आपातकालीन परिस्थितियों में कठिन पैदल रास्तों का सहारा लेना पड़ता है।

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अंतिम यात्रा में भी दिखी सड़क की कमी

चंद्रा देवी के निधन के बाद गांव में सड़क सुविधा न होने के कारण ग्रामीणों को उनकी अंतिम यात्रा के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ी। पहले ग्रामीणों ने पैदल रास्ते को तैयार किया और इसके बाद शव को करीब दो किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर सड़क तक पहुंचाया गया।

इसके बाद अंतिम यात्रा सड़क से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट तक पहुंची। इस घटना ने एक बार फिर सापुली सड़क का इंतजार कर रहे ग्रामीणों की परेशानियों को उजागर कर दिया।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और आपातकालीन सेवाओं तक पहुंच को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

बीमारी के दौरान डोली से पहुंचाया जाता था अस्पताल

चंद्रा देवी के भतीजे नरेंद्र दानू के अनुसार, चंद्रा देवी अविवाहित थीं और अपने भाइयों के साथ रहती थीं। लंबे समय से बीमारी से जूझ रही चंद्रा देवी को जब भी अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ती थी, ग्रामीणों को उन्हें डोली के सहारे पैदल रास्ते से सड़क तक पहुंचाना पड़ता था।

पहाड़ी क्षेत्र में बीमार व्यक्ति को कई किलोमीटर तक डोली से ले जाना ग्रामीणों के लिए बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। समय पर सड़क तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति कई बार मरीजों के लिए गंभीर साबित हो सकती है।

अधूरा रह गया सड़क पहुंचने का सपना

ग्रामीणों के अनुसार, चंद्रा देवी का सबसे बड़ा सपना था कि उनके जीवनकाल में गांव तक सड़क पहुंच जाए। लेकिन वर्षों के इंतजार के बाद भी यह सपना अधूरा रह गया।

सापुली सड़क का इंतजार केवल चंद्रा देवी की व्यक्तिगत इच्छा नहीं थी, बल्कि पूरे क्षेत्र के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग है। गांव के लोग आज भी बेहतर सड़क संपर्क की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि सड़क बनने से बुजुर्गों, बीमार लोगों, बच्चों और महिलाओं को सबसे अधिक राहत मिलेगी। इसके साथ ही गांव तक आवश्यक सामान पहुंचाना और आपातकालीन स्थिति में अस्पताल तक पहुंचना भी आसान हो सकेगा।

बदहाल पैदल रास्तों से भी जूझ रहे ग्रामीण

सड़क के अभाव के साथ-साथ गांव में पैदल आवाजाही के रास्ते भी बदहाल बताए जा रहे हैं। बरसात के मौसम में इन रास्तों पर चलना और अधिक मुश्किल हो जाता है। फिसलन और रास्तों की खराब स्थिति के कारण ग्रामीणों को रोजाना परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव तक सड़क का निर्माण नहीं होता, तब तक स्वास्थ्य और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को इसी तरह कठिनाइयों से जूझना पड़ेगा।

एक दशक बाद भी सड़क की उम्मीद

चंद्रा देवी की अंतिम यात्रा ने गांव तक सड़क पहुंचाने की मांग को फिर से चर्चा में ला दिया है। जिस सड़क का इंतजार उन्होंने वर्षों तक किया, वह उनके जीवनकाल में पूरी नहीं हो सकी।

आज सापुली सड़क का इंतजार ग्रामीणों के लिए केवल विकास की मांग नहीं, बल्कि बेहतर और सुरक्षित जीवन से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। चंद्रा देवी भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अधूरे सपने और गांव की सड़क समस्या ने प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

ग्रामीणों को उम्मीद है कि सापुली तोक तक सड़क पहुंचाने की दिशा में जल्द ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को बीमारी या अंतिम यात्रा जैसी परिस्थितियों में अपने परिजनों को कई किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर ले जाने की मजबूरी न झेलनी पड़े।